कुछ भी न रही कीमत इंसानों के खून का,
जा-ब-जा फ़क़त कत्ल का इक दौर है !
कत्ल कराके घूम रहे हैं जो हर तरफ ,
वही कहते हैं कि कातिल कोई और है!
होती थी जहाँ इबादतें इंसानियत की ,
आज वो जगह हैवानियत का ठौर है!
फिक्र-ए-वतन सता रही है जिन्हें ,
उनकी बयानबाजी भी काबिल-ए-गौर है !
इन्साफ की सोच भी बेईमानी है 'अरविन्द' ,
कातिलों को ही जब मुंसिफ बनाने का दौर है !
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