कौन कहता है कि ये गणतंत्र है ?
फैला जबसे भेड़ियों का तंत्र ये !
तरुणाई आ फँसी चंगुलों में देखो,
सुन लिया वादों का जबसे मंत्र ये !
सुबह का सूरज जलाने लग गया,
शाम दिखाता है तांडव मौत का !
हम बुझाते प्यास अपनी आंसुओं से,
खून उनके प्यास को है चूमता !
माताएं सूनी गोद देखकर रो रहीं,
लुट रही अस्मत हमारी बहनों की!
उजाड़ रहा है देखो आशियाँ रात दिन,
फिक्र उनको है सताती खंडहरों की !
आँख रहते भी हम अंधे हो चले,
देखो कैसा राक्षसी ये तंत्र है ?
कौन कहता है कि ये गणतंत्र है?
फैला जबसे भेड़ियों का तंत्र ये !
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